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ऑंखें भर आते हैं मेरे

  • Writer: chirajitpaul
    chirajitpaul
  • Feb 3, 2022
  • 1 min read


जब उनके बारे में सोचता हूँ

कोई दोष था, न खबर थी

नृशंषता से आश्चर्य होता हूँ


वह कहते खुद को संत था

अहिंसा का वाणी सुनाता था

खुद के शिष्यों मैं दरिन्दापन

कहाँ ख़तम कर पाया था


एक गोडसे आया बन्दुक लेके

गोलियां उतर दी सीने में

भूल गए सब शिष्य उनके

अहिंसा बह गयी पानी में


देर हज़ार छिपावन ब्राह्मण

वीरगति को चला गया

अहिंसा-वालों के तलवार ने जब

अपना पाठ भुला दिया


वह गुरु किस काम का

जिसका जीवन भर का सिख को

भूलने में शिष्यों को

एक पल, एक गोली, एक बहाना लगता हो

 
 
 

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